हां, मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, क्योंकि...

नब्बे के दशक में देश की राजनीति धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता में विभाजित थी ; अब एक और अधिक घातक विभाजन ‘राष्ट्रवादी’ अौर ‘राष्ट्र-विरोधी’ ताकतों के आधार पर करने की कोशिश की जा रही है। जब सोशल मीडिया पर पहली बार मुझ पर ‘राष्ट्र-विरोधी’ होने का आरोप लगाया गया तो मुझे गुस्सा आ गया था। अब उसके कुछ वर्ष बाद मौजूदा कर्कश राजनीतिक विमर्श में जब उदारतापूर्वक देशभक्ति के प्रमाण-पत्र बांटे जा रहे हैं, तो मैंने चीखकर यह कहना चाहा : गर्व से कहो हम देशद्रोही हैं। मैं बताता हूं कि क्यों।

हां, मैं ‘राष्ट्र-विरोधी’ हूं, क्योंकि मेरा भरोसा मुक्त रूप से भाषण देने के अधिकार की व्यापक परिभाषा में है, जैसी कि संविधान के अनुच्छेद 19 में दी गई है। केवल दो ही ‘विवेकसंगत बंधन’ हैं- हिंसा को उकसावा और नफरत फैलाने वाला भाषण न हो। नफरत फैलाने वाला भाषण क्या हो सकता है, बहस का विषय है। मसलन, राम जन्मभूमि आंदोलन का हिंदू राष्ट्र की खुलेआम गुहार लगाने वाला नारा, ‘जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा, क्या कानून का उल्लंघन माना जाएगा? क्या यह समुदायों के बीच शत्रुता फैलाता है? क्या खालिस्तानियों का नारा, ‘राज करेगा खालसा’ राजद्रोह माना जाएगा? इस पर बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नकारात्मक व्यवस्था दी थी। हां, मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, क्योंकि जहां मुझे संसद पर आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु के समर्थन में जेएनयू में हुई नारेबाजी बेचैन कर देती है वहीं, मैं इसे राजद्रोह का कृत्य नहीं मानता। वीडियो सबूत में ‘छात्रों’ (हमें अब भी मालूम नहीं कि वे सारे वाकई छात्र थे) को ‘भारत की बरबादी’ और अफजल की ‘शहादत’ की जय-जयकार वाले नारे लगाते दिखाया गया है। भाषण मुख्य रूप से सरकार की आलोचना है, लेकिन क्या छात्रों को आतंकी या आज़ादी की भावना के प्रति राजनीतिक सहानुभूति रखने वाले के रूप में देखने के लिए यह पर्याप्त है? और क्या वैचारिक समर्थन उन्हें ऐसे जेहादी के रूप में ब्रैंड करने के लिए काफी है, जिन पर राजद्रोह का मामला दायर किया जाए?

हां, मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, क्योंकि बहुलतावादी लोकतंत्र में मुझे भरोसा है कि हमें कश्मीरी पृथकतावादियों और पूर्वोत्तर के उन लोगों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, जो स्वायत्तता चाहते हैं। मैं श्रीनगर या इम्फाल के छात्र प्रदर्शनकारियों की बात उसी तरह सुनना चाहूंगा जैसे एफटीआईआई या जेएनयू में विरोध करने वालों की। उन लोगों को कठघरे में खड़ा कीजिए, जो कानून तोड़ते हैं, हिंसा भड़काते हैं, आतंकवाद पर उतारू हो जाते हैं, लेकिन असहमति रखने वालों के साथ संवाद साधने की क्षमता न खोएं। असहमति, अभिव्यक्ति के अधिकार जितना ही मूलभूत अधिकार है।

हां मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, क्योंकि राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्‌दों को लेकर दोमुंहेपन पर मेरा भरोसा नहीं है। यदि अफजल गुरु के लिए समर्थन को ‘राजद्रोह’ माना जाता है, तो जम्मू-कश्मीर कैबिनेट के आधे सदस्य दोषी होंगे, जहां भाजपा सत्ता में पीडीपी की भागीदार है। पीडीपी अफजल की फांसी को न्याय की नाकामी के रूप में विरोध करती है। यदि आज कश्मीरी युवक अफजल को ऐसे किसी व्यक्ति के रूप में देखते हैं, जिस पर झूठा आरोप लगाया गया था तो उन्हें कानूनी और राजनीतिक बहस के माध्यम से चुनौैती दी जानी चाहिए। किंतु क्या उन्हें सिर्फ इसलिए ‘जेहादी’ करार दिया जाएगा कि उनके विचार शेष देश की राय के विपरीत हैं? क्या हम हिंदू महासभा को इसके दायरे में लेंगे, जो आज भी हर 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे का महिमामंडन करती है, जबकि पूरा देश महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा होता है? क्या भाजपा सांसद साक्षी महाराज द्वारा गोडसे के बचाव को राष्ट्र-विरोधी कृत्य के रूप में देखा जाएगा अथवा राष्ट्रवाद की परिभाषा सत्ता की राजनीति की सहूलियत के मुताबिक तय होगी? हां, मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, क्योंकि मैं ऐसा गौरवान्वित हिंदू हूं, जो गायत्री मंत्र सुनकर सुबह जागता है और मुझे बीफ स्टिक भी पसंद है, जो भाजपा मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के मुताबिक पाकिस्तान भेज देने लायक विश्वासघात है। मैं व्यंजनों के माध्यम से अपने देश की समृद्ध विविधता का लुत्फ उठाता हूं : ईद पर कोरमा, गोवा में मेरे कैथोलिक पड़ोसियों के साथ पोर्क सोरपोटेल और दीपावली के दौरान श्रीखंड मेरे प्रिय व्यंजन हैं। मेरी पसंद के भोजन का अधिकार भी ऐसी स्वतंत्रता है, जिसे छोड़ने के लिए मैं तैयार नहीं हूं।

हां, मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, क्योंकि उन अराजक वकीलों से लड़ूंगा, जो महिला पत्रकारों पर ‘भारत माता’ के नाम पर हमला करते हैं (महिला पत्रकारों को दिसंबर 1992 में भी निशाना बनाया गया था), जबकि पुलिसकर्मी इन छद्‌म-देशभक्तों को रोकती नहीं। मैं वह अभिमानी भारतीय हूं, जो जवानों के बलिदान की सराहना करता है। मेरा मानना है कि हमारे सीमा रक्षकों को अधिक वेतन मिलना चाहिए। मैं समलैंगिकों के अधिकारों का समर्थक हूं, मैं सिद्धांतत: मौत की सजा के खिलाफ हूं, जाति, धर्म या लिंग के नाम पर हिंसा मुझे मंजूर नहीं। और हां, मुझे असुविधाजनक सच उठाना पसंद है : यदि यह सब मुझे राष्ट्र-विरोधी बनाता है, तो ऐसा ही सही। किंतु इन सबके ऊपर, मैं ‘राष्ट्र-विरोधी’ हूं, क्योंकि मुझे आम्बेडकर के गणतंत्रीय संविधान की अवधारणा पर विश्वास है, जिसमें नागरिक व कानून का राज केंद्र में है। किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह ‘एक राष्ट्र, एक धर्म, एक संस्कृति’ के वेश में विविधतापूर्ण समाज पर अपनी शैली का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ थोपे। और जब मैं ‘देश-द्रोही’ की गाली से बेचैन हो जाता हूं तो अपने मूल आयकन मोहम्मद अली की किंवदंती में शरण पाता हूं, जिन्होंने कैसियस क्ले के रूप में तब अपना गोल्ड मेडल नदी में फेंक दिया था, जब उन्हें उस रेस्तरां में प्रवेश नहीं दिया गया, जहां केवल श्वेतों को ही प्रवेश था। उन पर ‘राष्ट्र-विरोधी’ होने का लेबल लगा दिया गया और उनसे ओलिंपिक मेडल छीन लिया गया। कई वर्षों बाद वे 1996 के अटलांटा अोलिंपिक में मशाल प्रज्ज्वलित कर रहे थे। यह अपने महानतम लोक-नायकों में से एक के प्रति खेद व्यक्त करने का अमेरिकी तरीका था। मुझे उम्मीद है कि आप में से कुछ लोग एक दिन मुझे सॉरी कहेंगे!

पुनश्च : दिल्ली जिमखाना लिटरेचर फेस्टिवल में मैंने सुझाव दिया कि भाषण देने के अधिकार में नाराजगी व्यक्त करने का अधिकार भी शामिल होना चाहिए, बशर्ते यह हिंसा न भड़काए। सेना के एक पूर्व अधिकारी खड़े हो गए और चिल्लाए, ‘आप राष्ट्र-विरोधी’ हैं, आपको तो यहीं काट देना चाहिए! जब जिमखाना क्लब के सौम्य वातावरण में ऐसे स्वर सुनाई दें तो हम सब को बहुत ज्यादा चिंतित होना चाहिए।

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